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आज के time में डिप्रेशन (Depression) सिर्फ एक मेंटल issue नहीं रह गया है, बल्कि यह शरीर, मन और लाइफस्टाइल – तीनों से जुड़ी कन्डिशन बन चुकी है। बहुत-से लोग इसे कमजोरी समझते हैं, जबकि असल में यह शरीर और दिमाग के balance बिगड़ने का संकेत होता है। कई बार लोग डिप्रेशन से बचने के लिए फालतू का मनोरंजन या गलत लत में पड़ जाते हैं जो सही इलाज नहीं है। इसलिए, ये ज़रूर जानें कि डिप्रेशन जड़ से खत्म कैसे करें।
डिप्रेशन की कोई एक वजह नहीं होती। यह कई कारणों का मिला-जुला असर होता है, जैसे -
लगातार स्ट्रेस या इमोशनल shock
बचपन का trauma या unresolved emotions
रेलशनशिप या career pressure
नींद की कमी
hormonal imbalance
गलत खान-पान और lifestyle
समाज से दूरी
जब दिमाग में सेरोटोनिन, डोपामिनऔर नॉरएपिनेफ्रिन जैसे feel-good chemicals कम होने लगते हैं, तो मन उदास रहने लगता है, नकारात्मक सोच बढ़ती है और लाइफ में interest कम हो जाता है।
हर वक़्त उदासी या खालीपन
किसी काम में मन न लगना
छोटी बातों पर रोना या गुस्सा
नींद ज़्यादा या बहुत कम आना
भूख का कम या ज़्यादा हो जाना
थकान और low energy
खुद को बेकार समझना
अकेले रहने की इच्छा
सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि डिप्रेशन आपकी गलती नहीं है। यह आलस, कमजोरी या attention लेने का तरीका नहीं है। जब तक आप खुद को blame करते रहेंगे, healing शुरू नहीं होगी। खुद से कहें कि “मैं खराब नहीं हूँ”। साथ ही रोज़ की ये छोटी आदतें अपनाकर आप डिप्रेशन कम कर सकते हैं –
1. नींद अच्छी लें - नींद दिमाग की medicine है। देर रात जागना, mobile scrolling और irregular sleep depression को बढ़ाते हैं। रोज़ एक सही वक़्त पर सोना और उठना दिमाग को reset करता है।
2. धूप और nature से जुड़ें - सुबह की धूप शरीर में Vitamin D और serotonin बढ़ाती है। रोज़ 15 से 20 मिनट धूप में बैठना या walk करना mood को naturally बेहतर करता है।
3. शरीर को चलाइए - Heavy workout ज़रूरी नहीं। हल्की वॉक, stretching या yoga भी brain में dopamine release करता है। मूवमेंट डिप्रेशन का natural antidote है।
4. खाने से भी mood बनता है - बहुत ज़्यादा शुगर, junk food और caffeine mood को और unstable करते हैं। Balanced भोजन में प्रोटीन, healthy fats और फाइबर होने चाहिए।
आयुर्वेद में डिप्रेशन को “मनसिक अवसाद” कहते हैं। इसके पीछे का कारण मुख्य रूप से वात और तमस गुण का असंतुलन है। वात बढ़ने पर मन चंचल, डर और बेचैनी बढ़ती है, तमस बढ़ने पर आलस्य, उदासी और निराशा हावी हो जाती है। आयुर्वेद मानता है कि जब digestive fire कमजोर होती है, तो शरीर में आम (toxins) जमा होते हैं, जो मन तक असर डालते हैं। इसलिए आयुर्वेदिक healing में routine, सही आहार और प्राणायाम, मन को शांत करने वाले उपाय बहुत अहम माने जाते हैं।
1. अश्वगंधा - यह सबसे प्रसिद्ध आयुर्वेदिक हर्ब है। यह stress कम करता है, कॉर्टिसोल हार्मोन को balance करता है और चिंता व depression में मदद करता है।
2. ब्राह्मी - यह दिमाग को शांत करती है, overthinking कम करती है और memory व mood सुधारती है।
3. शंखपुष्पी - यह nervous system को मजबूत करती है और बेचैनी, घबराहट व नींद की दिक्कत में लाभ देती है।
4. जटामांसी - यह deep depression, insomnia और mood swings में उपयोगी मानी जाती है।
5. तगर - नींद न आने और ज़्यादा बेचैनी में सहायक होती है।
6. प्राणायाम और साँस का असर- डिप्रेशन में साँस उथली हो जाती है। दिमाग को पूरा oxygen नहीं मिलता। रोज़ 10 से 15 मिनट अनुलोम-विलोम, भ्रामरी प्राणायाम करने से nervous system calm होता है।
आज के इस ब्लॉग में हमनें आपको बताया कि डिप्रेशन जड़ से खत्म कैसे करें? लेकिन, आप सिर्फ़ इस जानकारी या सुझावों पर निर्भर ना रहें। अगर आप या आपके किसी साथी/रिश्तेदार को डिप्रेशन की समस्या है तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें या आयुकर्मा अस्पताल में भारत के बेस्ट आयुर्वेदिक डॉक्टर से डिप्रेशन का आयुर्वेदिक इलाज लें। हेल्थ से जुड़े ऐसे और भी ब्लॉग्स और आर्टिकल्स के लिए जुड़े रहें आयुकर्मा के साथ।
FAQ
डिप्रेशन का सबसे जल्दी इलाज क्या है?
डिप्रेशन से जल्दी राहत का सबसे सही तरीका है तुरंत सही डॉक्टर से बात करना, सपोर्ट लेना और लाइफस्टाइल सुधारना। मदद माँगना ही पहला और सबसे तेज़ कदम है।
आयुर्वेद में डिप्रेशन के लिए सबसे अच्छी दवा कौन सी है?
आयुर्वेद में डिप्रेशन के लिए एक ही “सबसे अच्छी” दवा नहीं होती, लेकिन ब्राह्मी, अश्वगंधा और शंखपुष्पी को मन को शांत करने और तनाव कम करने में उपयोगी माना जाता है।
डिप्रेशन में आदमी क्या करता है?
डिप्रेशन में आदमी अक्सर चुप रहने लगता है, लोगों से दूरी बनाता है, हर काम में मन नहीं लगता और खुद को अकेला व बेकार महसूस करता है।
डिप्रेशन का इलाज कितने महीने तक चलता है?
डिप्रेशन का इलाज आमतौर पर 3 से 6 महीने चलता है, लेकिन कुछ लोगों में यह 1 साल या उससे ज्यादा भी चल सकता है, यह समस्या की गंभीरता और इलाज के जवाब पर निर्भर करता है।
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