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जभी किसी मरीज की किडनी की रिपोर्ट में क्रिएटिनिन बढ़ा हुआ दिखता है, तो सबसे पहले यही सवाल आता है, “क्रिएटिनिन का हल क्या है?” और “क्रिएटिनिन कितना होने पर डायलिसिस होता है?” बहुत से लोग ये भी मान लेते हैं की जैसे ही क्रिएटिनिन एक निश्चित नंबर से ऊपर गया, डायलिसिस शुरू करनी पड़ेगी। लेकिन सच्चाई ये होती है कि डायलिसिस का फैसला सिर्फ क्रिएटिनिन के नंबर देखकर नहीं किया जाता। डायलिसिस का पूरा फैसला इससे कहीं ज्यादा चीज़ों पर निर्भर करता है। कई बार ऐसा भी होता है की मरीज का क्रिएटिनिन बहुत बढ़ा होता है फिर भी उसे डायलिसिस की जरूरत नहीं पड़ती, और वहीं कुछ मामलों में क्रिएटिनिन ज्यादा न होते हुए भी डायलिसिस जरूरी हो जाती है।
आज इस आर्टिकल में हम बात करेंगे क्रिएटिनिन असल में क्या बताता है, क्रिएटिनिन बढ़ने का मतलब क्या होता है, और क्रिएटिनिन कितना होने पर डायलिसिस होता है। ताकि डरने की जगह सही जानकारी के आधार पर सही फैसला लिया जा सके। पर सबसे पहले हम कुछ जरूरी सवालों पर ध्यान देंगे।
क्रिएटिनिन क्या होता है और यह शरीर में कैसे बनता है?
क्रिएटिनिन एक वेस्ट पदार्थ होता है, जो शरीर की मांसपेशियों में रोज़ होने वाली सामान्य गतिविधियों के दौरान बनता है। जैसी ही मांसपेशियाँ काम करना शुरू करती हैं, तो उनमें मौजूद क्रिएटिन नाम का पदार्थ टूटता है, और उसी प्रक्रिया में क्रिएटिनिन बनता है। पर इसका बनना कोई बीमारी नहीं है, बल्कि शरीर की एक नॉर्मल प्रक्रिया है।
और किडनी का काम होता है क्रिएटिनिन फिल्टर करके पेशाब के रास्ते शरीर से बाहर निकालना। लेकिन जब किडनी कमजोर होने लगती है या ठीक से फिल्टर नहीं कर पाती, तो क्रिएटिनिन खून में जमा होने लगता है और उसकी मात्रा बढ़ जाती है। इसलिए क्रिएटिनिन को किडनी की सेहत का एक अहम संकेत माना जाता है। हालांकि केवल क्रिएटिनिन देखकर ही किडनी की पूरी स्थिति का अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता, लेकिन यह जरूर बताता है कि किडनी अपना काम कितनी अच्छी तरह कर पा रही है।
नॉर्मल क्रिएटिनिन लेवल पुरुषों और महिलाओं में थोड़ा अलग होता है, क्योंकि दोनों में ही मांसपेशियों की मात्रा अलग-अलग होती है। आमतौर पर पुरुषों में क्रिएटिनिन की मात्रा 0.7 से 1.3 मिलीग्राम/डेसीलीटर (mg/dL) के बीच होनी चाहिए और महिलाओं में 0.6 से 1.1 mg/dL के बीच माना जाता है। पर सबका ये समझना बहुत जरूरी है की नॉर्मल” क्रिएटिनिन हर व्यक्ति के लिए बिल्कुल एक-सा नहीं होता। उम्र, शरीर का वजन, मांसपेशियों की बनावट, पानी की मात्रा और रिपोर्ट की लैब, इन सबका असर क्रिएटिनिन पर पड़ता है।
बहुत से लोग रिपोर्ट में क्रिएटिनिन थोड़ा सा बढ़ा देखकर घबरा जाते हैं, लेकिन हर बार इसका कारण स्थायी किडनी खराबी नहीं होता। इसलिए हम ये कह सकते हैं की, नहीं, क्रिएटिनिन बढ़ने का मतलब हमेशा किडनी फेल होना नहीं होता है। पर वो लोग जो ज़्यादा मांसपेशियों वाले होते हैं, भारी एक्सरसाइज़ करते हैं या अचानक ज़्यादा प्रोटीन लेने से भी क्रिएटिनिन थोड़ा बढ़ा हुआ आ सकता है। यह किडनी फेल होने का संकेत नहीं होता। पर अगर क्रिएटिनिन लगातार बढ़ता रहे, लंबे समय तक ऊँचा बना रहे और उसके साथ पेशाब कम होना, सूजन, थकान या सांस फूलने जैसे लक्षण भी हों, तब यह किडनी की गंभीर समस्या या किडनी फेल होने की ओर इशारा कर सकता है।
इस प्रश्न का सीधा उत्तर यही है की डायलिसिस किसी एक तय क्रिएटिनिन नंबर पर नहीं होती। पर बहुत से लोग ये समझते हैं कि क्रिएटिनिन अगर 5, 7 या 10 हो गया है इसका मतलब यही है की डायलिसिस कराना ज़रूरी है। जबकी मेडिकल तौर पर हकीकत इससे बहुत अलग है।
क्योंकि क्रिएटिनिन सिर्फ यह बताता है कि किडनी कितना कचरा बाहर नहीं निकाल पा रही, लेकिन डायलिसिस की ज़रूरत तब पड़ती है जब किडनी की खराबी की वजह से शरीर में गंभीर लक्षण आने लगते हैं। जैसे शरीर में पानी भरने लगे, सांस फूलने लगे, लगातार उल्टी-मतली हो, खून में पोटैशियम खतरनाक स्तर तक बढ़ जाए या eGFR बहुत नीचे चला जाए। इसलिए सही समझ यही है कि डायलिसिस का फैसला क्रिएटिनिन के नंबर से नहीं, बल्कि मरीज की पूरी स्थिति देखकर किया जाता है।
यह सवाल अक्सर बहुत से किडनी मरीजों और उनके परिवारों द्वारा पूछा जाता है, पर इस सवाल का जवाब “हाँ या नहीं” में नहीं है, बल्कि स्थिति पर निर्भर करता है। क्योंकि अगर किडनी की खराबी शुरुआती या मध्यम स्तर पर है, और मरीज में गंभीर लक्षण नहीं हैं, तो सही डाइट, जीवनशैली में बदलाव और अनुभवी डॉक्टर की देखरेख में आयुर्वेदिक उपचार से किडनी पर पड़ने वाला दबाव कम किया जा सकता है। लेकिन अगर किडनी बहुत ज्यादा खराब हो चुकी है, पेशाब लगभग बंद है, शरीर में ज़हर और पानी जमा हो रहा है, सांस फूल रही है या पोटैशियम खतरनाक स्तर पर है, तो उस समय सिर्फ डाइट या आयुर्वेद पर निर्भर रहना सुरक्षित नहीं होता। ऐसे हालात में डायलिसिस जीवन बचाने के लिए ज़रूरी हो सकती है।
इसलिए सही समझ यह है कि आयुर्वेद और डाइट डायलिसिस का विकल्प नहीं, बल्कि सही समय पर डायलिसिस से बचाव या उसे टालने का सहायक रास्ता हो सकते हैं, वो भी तब जब इलाज सही मार्गदर्शन में और नियमित जाँच के साथ किया जाए।
आज इस आर्टिकल में हमने कुछ जरूरी प्रश्नों जैसे, क्रिएटिनिन कितना होने पर डायलिसिस होता है, क्रिएटिनिन बढ़ने का मतलब क्या हमेशा किडनी फेल होना होता है और क्या आयुर्वेद या डाइट से डायलिसिस से बचा जा सकता है? ऐसे ही बहुत से सवालों पर विचार किया है, पर हमेशा ध्यान दें की डायलिसिस हमेशा मरीज की उम्र, लक्षण, पेशाब की मात्रा, सूजन, सांस की तकलीफ, eGFR और किडनी की कुल स्थिति इन सबको ध्यान में रख कर डॉक्टर द्वारा तय किया जाता है, कि डायलिसिस कब जरूरी है। और अगर इस आर्टिकल से आपको उपयोगी जानकारी मिली हो, तो आयु कर्मा के साथ जुड़े रहें। किडनी से जुड़ी अधिक जानकारी और डॉक्टर की सलाह के लिए आज ही हमें कॉल करें: +91 9667064100।
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